गाजीपुर पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत।
गाजीपुर – उत्तर प्रदेश के बंदा जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गयी।
जानकारी के अनुसार, बांदा ज़िला जेल में बंद मुख़्तार अंसारी को गुरुवार की शाम रानी दुर्गावाती मेडिकल कॉलेज में जेल के सुरक्षाकर्मियों ने इमर्जेंसी वॉर्ड में शाम 8.45 बजे भर्ती कराया था. उन्हें उल्टी की शिकायत और बेहोशी की हालत में लाया गया था। जहाँ नौ डॉक्टरों की टीम ने तत्काल मेडिकल सहायता उपबल्ध कराई लेकिन भरसक प्रयासों के बावजूद भी मृत्यु हो गई।
पिछले साल मुख़्तार अंसारी के बेटे उमर अंसारी ने अपने पिता की जान को ख़तरा होने का अंदेशा जताया था और सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। अदालत में दी गई याचिका में कहा गया कि मुख़्तार अंसारी को भरोसेमंद जानकारी मिली थी कि उनकी जान को भारी ख़तरा है और उन्हें बांदा जेल में मारने की साज़िश है।
मुख़्तार अंसारी को फ़िरौती के मामले में साल 2019 से पंजाब की रूपनगर जेल में रखा गया था। साल 2021 में उन्हें उत्तर प्रदेश की पुलिस बंदा लेकर आई. तबसे वो यहीं पर बंद थे। कांग्रेस ने उनकी मौत पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने कहा “मुख़्तार अंसारी ने कुछ दिन पहले आरोप लगाया था कि उन्हें धीमा ज़हर दिया जा रहा है. और आज प्रशासन बता रहा है कि उनका दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई।
इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए. हाई कोर्ट के मौजूदा जज की निगरानी में जांच होनी चाहिए ताकि पता चले लोगों को कि जेलों में क्या हो रहा है?” समाजवादी पार्टी ने मुख़्तार अंसारी की मृत्यु पर दुख जताया है. सपा नेता अमीक जामेई ने मामले की की मांग की है।
लखनऊ से बीबीसी संवाददाता अनंत झणाणें के मुताबिक रात में ही उनके भाई अफ़जाल अंसारी और बेटे उमर अपने रिश्तेदारों के साथ बांदा के लिए निकल पड़े रात में ही शव को पोस्टमॉर्टम के लिए बंदा मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल ले जाया गया. उनका शव ग़ाज़ीपुर में उनके पैतृक निवास ले जाया जाएगा।
माफ़िया से राजनेता बने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में मऊ से पाँच बार के विधायक चुने गए थे पिछले साल अप्रैल में मुख़्तार अंसारी को बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय हत्या मामले में 10 साल की सज़ा सुनाई गई थी उनके भाई और ग़ाजीपुर से सांसद रहे अफ़जाल अंसारी को भी इस मामले में चार साल की सज़ा सुनाई गई थी।
ग़ाजीपुर ज़िले के मुहम्मदाबाद थाने में दर्ज आपराधिक इतिहास के अनुसार, मुख़्तार अंसारी पर कुल 65 मुक़दमे चल दर्ज थे मुख़्तार अंसारी पर 1996 में विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी और कोयला व्यापारी नंदकिशोर रुंगटा के अपहरण और बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में शामिल होने का मुक़दमा दर्ज किया गया था। वर्ष 2005 में कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई थी।
कई अन्य मामलों में मिली थी सज़ा
पिछले कुछ सालों से अंसारी परिवार चर्चा में रहा है. मऊ में अंसारी की कई कथित ग़ैरक़ानूनी संपत्ति को ध्वस्त कर दिया गया था। सितंबर 2022 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने मुख़्तार अंसारी को एक जेलर को धमकाने के मामले में सात साल की सज़ा सुनाई थी. ये मामला साल 2003 का था
इसके कुछ दिन बाद 1999 के एक मामले में गैंगस्टर एक्ट के तहत उन्हें पांच साल सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गई और 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया । जुलाई 2022 में मुख़्तार अंसारी की पत्नी अफ़सा अंसारी और उनके बेटे अब्बास अंसारी को फ़रार घोषित कर दिया गया । अगस्त 2020 में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने अफ़जाल अंसारी के घर को ढहा दिया. आरोप था कि ये घर ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बनाया गया था।
उन पर कुल विभिन्न अपराधों में 65 मुक़दमे चल रहे थे. उन पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट) और गैंगस्टर ऐक्ट के तहत भी मामले दर्ज थे। इनमें से कुछ अहम मामलों में अदालत ने सबूतों की कमी, गवाहों के पलट जाने और सरकारी वकील की कमज़ोर पैरवी के कारण इन्हें बरी कर दिया गया लेकिन कुछ सालों में कुछ मुक़दमे नतीजे तक पहुंचे और उन्हें सज़ा हुई।
चर्चित कृष्णानंद राय हत्याकांडः-
1985 से अंसारी परिवार के पास रही गाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट 17 साल बाद 2002 के चुनाव में उनसे बीजेपी के कृष्णानंद राय ने छीन ली।लेकिन वे विधायक के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, तीन साल बाद उनकी हत्या कर दी गयी।
पूर्वांचल में आग की तरह फैली इस हत्याकांड की ख़बर को मौक़ा-ए-वारदात पर कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह ने बताया था कि, “वह एक कार्यक्रम का उद्घाटन करके लौट रहे थे कि तभी उनकी बुलेट प्रूफ़ टाटा सूमो गाड़ी को चारों तरफ़ से घेर कर अंधाधुंध फ़ायरिंग की गयी।
हमले के लिए स्पॉट ऐसी सड़क को चुना गया था जहां से गाड़ी दाएँ-बाएँ मोड़ने का कोई स्कोप नहीं था. कृष्णानंद के साथ कुल 6 और लोग गाड़ी में थे. एके-47 से तक़रीबन 500 गोलियां चलाई गईं, सभी सातों लोग मारे गये जानकारों के अनुसार ग़ाज़ीपुर की अपनी पुरानी पारिवारिक सीट हार जाने से मुख़्तार अंसारी नाराज़ थे. कृष्णानंद हत्याकांड के वक़्त में जेल में बंद होने के बावजूद मुख़्तार अंसारी को इस हत्याकांड में नामज़द किया गया।
पवन के अनुसार,, “गाज़ीपुर से सांसद और मौजूदा सरकार में मंत्री मनोज सिन्हा की पूरी पॉलिटिक्स इसी हत्याकांड के बाद पुरज़ोर तरीक़े से खड़ी हुई. मनोज इस मामले में मुख़्तार के ख़िलाफ़ गवाह हैं. कृष्णानन्द भूमिहार थे और उनके सजातीय सिन्हा ने उन्हें ‘न्याय दिलवाने के लिए बिना डरे संघर्ष करने वाले’ एकमात्र नेता होने के नाम पर वोट मांगते हुए कई चुनाव जीत ली
साल 2019 में बीबीसी पर प्रकाशित कहानी के मुताबिक, मुख़्तार अंसारी के दादा देश की आज़ादी के संघर्ष में गांधी जी का साथ देने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी थे। मुख़्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947 की लड़ाई में शहादत के लिए महावीर चक्र से नवाज़ा गया था.
ग़ाज़ीपुर में साफ़-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड से आने वाले मुख़्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे. भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख़्तार अंसारी के चाचा हैं.
मुख़्तार के बड़े भाई अफ़जाल अंसारी ग़ाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा से लगतार पाँच बार (1985 से 1996 तक) विधायक रह चुके हैं और 2004 में ग़ाज़ीपुर से ही सांसद का चुनाव भी जीत चुके हैं मुख़्तार के दूसरे भाई सिबकातुल्ला अंसारी भी 2007 और 2012 के चुनाव में मोहम्मदाबाद से ही विधायक रह चुके हैं।
1996 में बसपा के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले मुख़्तार ने 2002, 2007, 2012 और फिर 2017 में भी मऊ से जीत हासिल की. इनमें से आख़िरी तीन चुनाव उन्होंने देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए लड़े.
मुख़्तार अंसारी के दो बेटे हैं. उनके बड़े बेटे अब्बास अंसारी ने 2017 के चुनाव में मऊ ज़िले की ही घोसी विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर अपना पहला चुनाव लड़ा था और 7 हज़ार वोटों से अंतर से हार गए थे। मुख़्तार अंसारी के भाई अफ़जाल अंसारी ने अपना राजनीतिक करियर कम्युनिस्ट पार्टी से शुरू किया था, फिर समाजवादी पार्टी में गये।
इसके बाद उन्होंने ‘क़ौमी एकता दल’ के नाम से अपनी पार्टी का गठन किया और 2017 में बसपा में शामिल हो गये वहीं मुख़्तार बसपा से शुरू करने के बाद निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा, फिर 2012 में पारिवारिक पार्टी क़ौमी एकता दल से खड़े हुए और 2017 में पार्टी के बसपा में विलय होने के साथ ही वह भी बसपा में शामिल हो गये।
यहां यह दिलचस्प है कि कभी मुख़्तार अंसारी को ‘गरीबों का मसीहा’ बताने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने अप्रैल 2010 में अंसारी भाइयों को ‘अपराधों में शामिल’ बताते हुए बसपा से निकाल दिया था । 2017 के चुनाव से पहले उन्होंने ‘अदालत में उन पर कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है’ कहते हुए अंसारी भाइयों की पार्टी ‘क़ौमी एकता दल’ का विलय बसपा में करवा लिया।
आए हैं. राजनीतिक तौर पर हमसे बड़ी औक़ात है मुख़्तार की. उनका ग्लैमर कोशेंट बड़ा है. आज हम गाज़ीपुर से बाहर कहीं भी जाते हैं तो लोग हमारी पहचान उनके नाम से करवाते हैं।
अफ़ज़ाल ने कहा था, “सिर्फ़ ग़ाज़ीपुर के 8 फ़ीसदी मुसलमान हमें नहीं जिता सकते, यहां के हिंदू हमें जिताते हैं. आख़िर हम भी हर सुख-दुःख में उनके साथ खड़े रहे, रोज़े में मुँह पर रुमाल रखकर यहां लोगों के साथ हाथियों पर बैठकर होली तक खेली है. यह सब हमारे अपने लोग हैं, इसलिए तो हमें इनके वोटों पर भरोसा रहता है।

