Monday, June 1, 2026
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जमानिया मानस सेवा समिति द्वारा, संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का हुआ आयोंजन । 

जमानिया मानस सेवा समिति द्वारा, संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का हुआ आयोंजन । 

जमानिया ⁄  गाजीपुर– ग्राम सभा बूढ़ाडीह में मानस सेवा समिति द्वारा संगीतमय भागवत कथा का आयोजन  किया गया जिस दौरान  कथावाचक श्री बाल स्वामी अशोकानन्द जी महाराज के मुखारविंद से प्रतिदिन संगीतमय कथा में भक्ति सच्ची सें मोक्ष प्राप्त  प्राप्त का मार्ग बताया गया है।साथ ही कहा कि यदि भक्ति सच्ची हो तो उम्र का बंधन नही होता ‘ध्रुव की कथा’ ने यही सिद्ध किया है। ‘पुरजनोपाख्यान’ मे इन्द्रियों की प्रबलता के बारे मे बताया गया है। इसमे ‘भरत-चरित्र’ के माध्यम से यह बताया गया है कि भरतजी कैसे एक हिरण के मोह मे पडकर अपने तीन जन्म गवा देते है। ‘भवाटवी’ के प्रसंग में यह बताया गया है कि व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के बस मे होकर कैसे अपनी दुर्गति करता है। ‘नरकों का वर्णन’ बताया गया है कि मरने के बाद व्यक्ति की अपने-अपने कर्मो के हिसाब से कैसे नरको की यातना भोजनी पडती है।

षष्ट स्कन्ध मे भगवान ‘नाम की महिमा’ के सम्बन्ध मे ‘अजामिलोपाख्यान’ है, “नारायण कवच” का वर्णन है जिससे वृत्रासुर का वघ होता है, नारायण कवच वास्तव मे भगवान के विभिन्न नाम है जिसे धारण करने वाले व्यक्ति को कोई परास्त नही कर सकता। ‘पुंसवन विधि’ एक संस्कार है जिसके बारे मे बताया गया है।

इसमे ‘प्रहलाद-चरित्र’ के माध्यम से बताया गया है कि हजारों मुसीबत आने पर भी भगवान का नाम न छूटे, यदि भगवान का बैरी पिता ही क्यों न हो तो उसे भी छोड देना चाहिये। मानव-धर्म, वर्ण-धर्म, स्त्री-धर्म, ब्रह्मचर्य गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमो के नियम का कैसे पालन करना चाहिये, इसका निरुपण है। कर्म व्यक्ति को कैसे करना चाहिये, यहि इस स्कन्ध का सार है।

भगवान कैसे भक्त के चरण पकडे हुये व्यक्ति का पहले और बाद मे भक्त का उद्धार करते है यह ‘गजेन्द्र-गाह कथा’ के माध्यम से बताया गया है। ‘समुद्र मंथन’, ‘मोहिनी अवतार’, वामन अवतार’, के माध्यम से भगवान की भक्ति और लीलाओं का वर्णन है।

नवम स्कन्ध मे ‘सूर्य-वंश’ और चन्द्र-वंश’ की कथाओं के माध्यम से उन राजाओं का वर्णन है जिनकी भक्ति के कारण भगवान ने उन्के वंश मे जन्म लिया। जिसका चरित्र सुनने मात्र से जीव पवित्र हो जाता है। यही इस स्कन्ध का सार है। भागवत का ‘हृदय’ दशम स्कन्ध है बडे-बडे संत महात्मा, भक्त के प्राण है यह दशम स्कन्ध, भगवान अजन्मा है, उनका न जन्म होता है न मृत्यु, श्री कृष्ण का तो केवल ‘प्राकट्य’ होता है, भगवान का प्राकट्य किसके जीवन मे, और क्यों होता है, किस तरह के भक्त भगवान को प्रिय है, भक्तो पर कृपा करने के लिये, उन्ही की ‘पूजा – पद्धति’ स्वीकार करने के लिये, चाहे जैसे भी पद्धति हो, के लिये ही भगवान का प्राकट्य हुआ, उनकी सारी लीलाये, केवल अपने भक्तो के लिये थी |

जिस-जिस भक्त ने उद्धार चाहा, वह राक्षस बनकर उनके सामने आता गया और जिसने उनके साथ क्रिडा करनी चाही वह भक्त, सखा, गोपी, के माध्यम से सामने आते गये, उद्देश्य केवल एक था – ‘श्री कृष्ण की प्राप्ति’ भगवान की इन्ही ‘दिव्य लीलाओ का वर्णन’ इस स्कन्ध मे है जहां ‘पूतना मोक्ष’ उखल बंधन’ चीर हरण’ ‘ गोवर्धन’ जैसी दिव्य लीला और रास, महारास, गोपीगीत तो दिवाति दिव्य लीलायें है। इन दिव्य लीलाओ का श्रवण, चिंतन, मनन बस यही जीवन का सार’ है।

श्री बाल स्वामी अशोकानन्द जी महाराज ने बताया श्रीमद् भागवत कथा मानस सेवा समिति द्वारा भागवत कथा आयोजन में सहयोगी हरखन यादव ,चंद्रमा यादव ,मुन्ना पासवान,देवानंद यादव,मनोज यादव, धर्मराज यादव ,मुरली यादव व सभी ग्रामवासियों एवं युवाओं के सहयोग से संगीतमय भागवत कथा का आयोजन किया गया। भागवत कथा में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु पधार कर कथा का श्रवण लाभ ले रहे हैं। 11 नवंबर को भागवत कथा का समापन पर यजमान द्वारा यज्ञ में पूर्णाहुति देकर यज्ञ संपन्न होगा और भोज एवं महा प्रसादी का आयोजन किया जाएगा।

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