फर्जी पत्रकार बन कानून व्यवस्था के साथ कर रहे है खिलवाड़
चौथे स्तंभ की नींव को खोखला कर रहें हैं फर्जी पत्रकारवर्तमान समय मे बढ़ती बेरोजगारी और घटते रोजगार के इस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में मीडिया एक एक बाज़ारू खिलौनों की तरह बिक रही हैं आज ग्रामीण क्षेत्रोंं में मीडिया बारिश के पानी में उठते बुलबुलों की तरह उठते हैं और डूब जाते हैं जिनका कोई अस्तित्व नहीं हैं आज क्षेत्रों में मीडिया के नाम पर लोग सरकारी विभागों में फर्जी पत्रकार बनकर घूम रहे लोगों ने पत्रकारिता को एक धंधे के रूप में अपना लिया है फलस्वरूप सामाजिक व्यवस्था में अपराध अपराध अपना पैर फैलाता जा रहा है।
ना कोई तपस्या ना कोई फल,भस्मासुर बन घूम रहे हैं हर पल-ग्रामीण क्षेत्रों में फर्जी पत्रकार बनकर घूम रहे लोगों ने पत्रकारिता को एक धंधे के रूप में अपना लिया है और साथ ही सरकारी विभागों में घुसपैठ बनाकर कर अपने को पत्रकार बताते हुवे सरकारी विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों को डराते धमकाते हैं कि अगर कुछ नहीं दोगे तो मीडिया में निकल जायेगा अधिकारियों और कर्मचारियों को यह तक पता नहीं होता कि पत्रकार होते कैसे हैं।
हमारे भारतीय सामाजिक व्यवस्था में अपराध, अन्याय, ऊंच- नीच, धर्म-अधर्म आदि के सामाजिक भेदभाव खत्म करने के लिए भारतीय सामाजिक व्यवस्था में चार स्तंभों की स्थापना की गई जिसमें कई भाग हैं व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, तथा न्यायपालिका और चौथा सबसे महत्वपूर्णभारतीय मीडिया, इन चार स्तभों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली मीडिया अपने पथ से भ्रमीत होकर सामाजिक व्ययस्था में एक मीडियेटर के बतौर कार्य कार्य करने लगे तो क्या होगा ? सवाल हैं
क्षेत्र में अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं फर्जी पत्रकार
क्षेत्र में फर्जी पत्रकार बनकर मोबाइल कैमरा में द्वारा फोटो और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में डालकर अधिकारियों को मूर्ख बनाते हैं और अपना काम जाते रहते हैं इन फर्जी लोगों पर अधिकारी डर के मारे कुछ भूल नहीं पाते और बिचौलिए क्षेत्र में खुलेआम घूम रहे हैं बिचौलियों का काम जिसके कारण सामाजिक कानून व्यवस्था मे इस आधुनिक समय और लोकतंत्र के आस्थाजओं ,व नागरिकों के मूल अधिकार व स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए कानून के शासन से बढ़कर कोई विकल्प नहीं है
कहाँ जाता हैं कि कानून सबके लिए समान है यह सब बातें हैं किताबों में अच्छी लगती हैं लेकिन वास्तव में कानून व्यवस्था बिचौलियों के हाथ की कठपुतली है जैसे घूमआए वैसे ही घूमता हैं हमारा समाज बहुत अच्छी तरह से जानता और पहचानता है लेकिन सच बोलने की किसी में हिम्मत नहीं कि झूठ के खिलाफ आवाज उठा सके।
आज आवाज बंद क्यों है इसका कारण क्या है। हमारी नपुंसकता या हमारी चुप्पी जो हमारी गलती है। आज हमारी इसी नपुंसकता और चुप्पी जिसके परिणाम स्वरूप इस समाज में आज कानून व्यवस्था बिचौलियों के हाथ की कठपुतली बनकार रह गयी हैं।

