गाज़ीपुर 18अगस्त 1942 …**नंदगंज रेलवे स्टेशन पर क्रान्तकारियों द्वारा लूटे गये थे मालगाड़ी के 52 डिब्बे अंग्रेजों ने करीब 175 राउण्ड चलाई थीं गोलियां।
नंदगंज / गाजीपुर- स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में नंदगंज और करण्डा क्षेत्र के भी वीर सपूत क्रान्तिकारियों का योगदान अविस्मरणीय है। गांधी जी के 9 अगस्त 1942 को बम्बई अधिवेशन में करो या मरो के आह्वान पर गाजीपुर के नंदगंज व करण्डा क्षेत्र में भी क्रान्तिकारियों का खून खौलने लगा।

बाबू भोला सिंह के नेतृत्व में क्षेत्र के क्रांतिकारियों ने बैठक करके पहले नंदगंज थाना पर कब्जा करके तिरंगा फहराने का निर्णय हुआ। जिसके तहत 18 अगस्त 1942 को बरहपुर निवासी बाबू भोलानाथ सिंह के नेतृत्व में क्षेत्र के क्रांतिकारियों ने बनी योजना के तहत पहले नंदगंज थाने में तिरंगा फहराने के लिये भारत माता के जयघोष का नारा लगाते हुए चल दिये।
लेकिन तत्कालीन नंदगंज थानाध्यक्ष विद्या शंकर पांडेय की चालाकी भरी दोहरी चाल चलते हुए पूरे जोश में भरे क्रांतिकारियों को नंदगंज रेलवे स्टेशन पर खड़ी मालगाड़ी के 52 डिब्बे को लूटने के लिये इंगित कर दिया। फिर क्या था, क्रान्तिकारी भारत माता की जय और वन्देमातरम का नारा बोलते हुए नंदगंज रेलवे स्टेशन पर पहुँच कर अंग्रेज सैनिकों को रसद ले जा रही खड़ी मालगाड़ी पर टूट पड़े
इसी बीच क्रान्तिकारियों की टोली में मैनपुर से श्याम नारायन सिंह, करण्डा से बचाई सिंह और बलुवा से रामपरीखा सिंह भी अपनी अपनी टोलियां लेकर पहुँच गये। बताते है कि मालगाड़ी के डिब्बे का ताला न टूटने पर बरहपुर गांव के कन्हैया लोहार तथा बेलासी गांव के डोमा लोहार छीनी हथौड़ा लेकर पहुँच कर ताला तोड़ने लगे।
इसी को लेकर वही थानाध्यक्ष विद्या शंकर पाण्डेय ने अपने तत्कालीन जिलाधिकारी तथा एसपी को सूचना दे दिया कि हजारों क्रान्तिकारी नंदगंज स्टेशन पर खड़ी मालगाड़ी को लूट रहें है।इधर क्रान्तकारियों ने अंग्रेज फौज को आने से रोकने के लिये स्टेशन से पूरब तीन किमी दूर पुलिया को तोड़ देने से मार्ग अवरुद्ध हो गया था।
लेकिन अंग्रेज सिपाही उसे ठीक करते हुए भारी संख्या में मौके पर पहुँच गये। बताया जाता है कि मौके पर पहुंचे अंग्रेज सिपाहियों ने क्रांतिकारियों पर करीब 175 राउंड गोलियां दागीं थी।कुछ को खड़ा करके गोली दागी थी। जिसमें करीब सौ क्रांतिकारी शहीद हुए तथा हजारों घायल हो गये थे। उल्लेखनीय है कि इस गोलीकांड के सम्बन्ध में 80 लोगों के शहीद होने की पुष्टि भारत छोड़ो आन्दोलन की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर मुम्बई दूरदर्शन ने अपने प्रसारण के जरिये किया था।
सबसे दुःखद बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी नंदगंज में आजतक इन शहीदों की स्मृति में शहीदों का कोई अभिलेख व शिलापट्ट नहीं बनवाया जा सका। हाँ ,देश आजाद होने के बाद अंग्रेजों द्वारा क्रान्तकारियों पर चलायी गयी गोली से अनेको शहीद तथा घायल हुए स्थल पर बरहपुर गांव के बाबू सहदेव सिंह द्वारा दी गयी जमीन पर बाबू भोलानाथ सिंह ने शहीदों की याद में शहीद स्मारक इंटर कालेज नंदगंज की नीव रखी।
जो आज भी फल फूल रही है।यहां से असंख्य छात्र छात्राएं बड़े अफसर/ अधिकारी तथा जवान देश की सेवा कर रहे है। यही से कारगिल शहीद अमर शेषनाथ यादव तथा उनकी पत्नी श्रीमती सरोज यादव भी शिक्षा ग्रहण की है। बताया जाता है कि मालगाड़ी लूटकांड घटना के बाद अंग्रेज अफसरों द्वारा बाबू भोलानाथ सिंह को जिन्दा या मुर्दा गिरफ्तार करने के दबाव के कारण बाबू भोलानाथ सिंह फरार हो गए थे।
क्योंकि वे जानते थे कि हमारे गिरफ्तार होते ही क्रान्तिकारियों का मनोबल टूट जायेगा। बाबू भोलानाथ सिंह के नहीं मिलने पर खुन्नस खाये अंग्रजो ने बरहपुर स्थित उनका बंगला जमीदोज कर दिया। देश आजाद होने के बाद जेल से रिहा होने बाद उन्होंने स्वतंत्रता पेंशन लेने से इंकार करते हुए कहा कि किसी अन्य जरुरत मंद भाई को दे दी जाय।क्षेत्र के बरहपुर गांव निवासी नब्बे वर्षीय भरत कुशवाहा ने स्मृति पर बल देते हुए।
बताया कि मालगाड़ी लूटे जाने का शोर होते ही क्षेत्र के लोग पहुँचने लगे और कपड़ा का गठ्ठर खाना के डिब्बा आदि जो भी मिलता था लेकर भागने लगे। मैं भी स्टेशन से थोड़ा दूर भैस चरा रहा था। मैं भी जाकर एक कपड़े का गठ्ठर उठा लाया। शाम होते ही अंग्रेज सिपाही और अफसर आ गये। अब लोग डर के कारण लाये सामानों को लोग कुँआ,नदी तथा ईंख के खेत में छिपाने लगे।
मैं भी कपड़े को गठ्ठर को गोबर के ढेर में गाड़ दिया। बड़े लोग घर छोड़कर भाग गये। अंग्रेज अफसर इतने नाराज थे कि बरहपुर गांव को फूँक देने का आदेश दे दिये थे। लेकिन गांव के जमींदार बाबू सहदेव सिंह ने दस मड़ई जला कर अंग्रेजों को सूचना दे दिया कि बरहपुर गांव को फूँक दिया गया है। नदी में फेंका गया सामान को कोई भी उठा ले जा रहा था।
लोग इतने भयभीत थे कि घर में लूट का एक भी सामान नहीं रख रहे थे। दुःख है कि देश की आजादी में नंदगंज क्षेत्र में इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी यह स्थान अब तक उपेक्षित होने के साथ ही त्याग बलिदान की मूर्ति क्रान्तिकारी स्व.बाबू भोलानाथ सिंह की कहीं भी आदमकद प्रतिमा भी नहीं लगायी गयी है।
(विजय प्रकाश श्रीवास्तव)

