कार्तिक शुक्ल पक्ष आस्था और विश्वास के महापर्व छठ पर माँताओं नें परिवार के मंगलकामना हेतु की अस्ताचलगामी भगवान भाष्कर की उपासना।
जमानियाॅ ⁄ गाजीपुर – स्थानीय नगर स्थित सतुवानी घाट‚ कर्पूरा घाट‚ कंकडवा घाट‚ बलुआ घाट‚ मुन्नान घाट ‚चक्काबाध गंगा तटों पर आस्था और विश्वास के महापर्व छठ को रविवार को बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया गया ।
जिस दौरान व्रती माँताए अपने परिवार संग छठी मईया की जयकारे और गीत गाते हुए गाँजे- बाजें के साथ गंगा तट पहुँचकर अस्ताचलगामी भगवान भाष्कर की उपासना कर अपने परिवार के कुशल–मंगल की कामना की गयी। छठ पर्व, छइठ या षष्ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। आस्था और विश्वास के महापर्व छठ का आज तीसरे दिन है। उत्तर प्रदेश में छठ महापर्व धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है। छठ पूजा में सूर्यदेव और छठी मैया की उपासना का खास महत्व माना जाता है।

छठ पूजा में के तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्घ्य दिया जाता है जिसका बहुत महत्व है। इस दिन सभी लोग मिलकर पूजा की तैयारिया करते है। छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद जैसे ठेकुआ‚ चावल के लड्डू जिसे कचवनिया भी कहा जाता है, बनाया जाता है । छठ पूजा के लिए एक बांस की बनी हुयी टोकरी जिसे दउरा कहते है में पूजा के प्रसाद,फल डालकर देवकारी में रख दिया जाता है। वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल,और पूजा का अन्य सामान लेकर दउरा में रख कर घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सर के ऊपर की तरफ रखते है। छठ घाट की तरफ जाते हुए रास्ते में प्रायः महिलाये छठ का गीत गाते हुए जाती है

फोटों– जमानियाॅ नगर स्थित गंगा तट पर इकठ्ठा भीड़।
नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है। नदी से मिटटी निकाल कर छठ माता का जो चौरा बना रहता है उस पर पूजा का सारा सामान रखकर नारियल चढाते है और दीप जलाते है। सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करते है।
सामग्रियों में, व्रतियों द्वारा स्वनिर्मित गेहूं के आटे से निर्मित ‘ठेकुआ’ सम्मिलित होते हैं। यह ठेकुआ इसलिए कहलाता है क्योंकि इसे काठ के एक विशेष प्रकार के डिजाइनदार फर्म पर आटे की लुगधी को ठोकर बनाया जाता है। उपरोक्त पकवान के अतिरिक्त कार्तिक मास में खेतों में उपजे सभी नए कन्द-मूल, फलसब्जी, मसाले व अन्नादि यथा गन्ना, ओल, हल्दी, नारियल, नींबू(बड़ा), पके केले आदि चढ़ाए जाते हैं।
ये सभी वस्तुएं साबूत (बिना कटे टूटे) ही अर्पित होते हैं। इसके अतिरिक्त दीप जलाने हेतु,नए दीपक,नई बत्तियाँ व घी ले जाकर घाट पर दीपक जलाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण अन्न जो है वह है कुसही केराव के दानें (हल्का हरा काला, मटर से थोड़ा छोटा दाना) हैं जो टोकरे में लाए तो जाते हैं पर सांध्य अर्घ्य में सूरजदेव को अर्पित नहीं किए जाते है।इन्हें टोकरे में कल सुबह उगते सूर्य को अर्पण करने हेतु सुरक्षित रख दिया जाता है। बहुत सारे लोग घाट पर रात भर ठहरते है वही कुछ लोग छठ का गीत गाते हुए सारा सामान लेकर घर आ जाते है और उसे देवकरी में रख देते है ।
यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। रविवार को को शहर और ग्रामीण अचंलों के गंगा किनारे सरोवर, नहरों में व्रती महिलाओं ने भगवान सूर्य की पूजा कर उन्हे पहला अर्घ्य समर्पित किया। कोरोना काल के दो वर्ष बाद पहली बार श्रद्धालुओं ने गंगा घाट और सरोवरों में जाने की छूट मिली जिसके ग्रामीण अंचलों में गहमर‚ जमानियां, भदौरा, रेवतीपुर ब्लाकों में धूमधाम के साथ छठ महापर्व मनाया गया।
गंगा घाटों पर प्रशासन की चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था देखने को मिली। शहर के हर घाटों पर सफाई के साथ-साथ आपदा कर्मी भी तैनात दिखे और गंगा के पानी बैरिकेडिंग भी किया गया था जिससे कि व्रती महिलाएं गहरे पानी में न जाये। उपजिलाधिकारी जमानियाँ भारत भार्गव और कोतवाली पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था के लिए संध्याकाल मे गंगा घाट पर नाव के माध्यम से सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया।

