बंगाली दादा के चाय की दुकान
जमानियाँ तहसील मुख्यालय- बंगाली दादा की चाय दुकान जैसे की लखनऊ का काफी हाउस / चाय की चुस्कियाँ बैठक बाजों का मिजाज बौद्धिकता से लबरेज कर देती हैं /और…फिर तो चर्चाओं का वो दौर चलता है कि बातें गंगा पर बेतरतीब पुल और बदहाल अस्पताल से कन्नी कटाती, बदलाव के बयार के सहारे /वक्त के मारे राष्ट्रीय राजमार्ग पर फर्राटे भरने की नाकाम कोशिश करती हुई .मन की बात से भी दिल्ली की दहलीज छूने लगती हैं/…और लगने लगता है कि यह अपने बंगाली दादा और सोनू की चाय का ही नहीं बल्कि पी एम चायवाले मोदी- चाय का असर घर कर गया हो / और…फिर राजनीतिक कर्णधारों की नैतिकता का प्रश्न भी प्रासंगिक लगने लगता है।
कि क्या मतलब है स्टैंड अप इंडिया का ? गाँवों को सांसदो द्वारा गोद लिए जाने का औचित्य क्या है ? सरकार के नीति निर्धारण से लेकर क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर सवालों की बौछार शुरू हो जाती है /स्पष्टीकरण , प्रश्न, प्रतिप्रश्नो का एक लंबा दौर /और फिर शून्यकाल /तारांकित सवालों के जवाब /संसदीय संस्कृति का फालो अप /कार्यवाहक सभापति की अनुमति से …बहस आगे के लिए टाल दी जाती है ….. जी हाँ/और एक बार फिर चलते चलते चाय …..चाह बनकर आगामी कार्यशाला में समय से समाजवादी प्रतिबद्धता के साथ हाजिर हो जाती है
एक छाया चित्र की भाँति अपने स्थानीय महापुरुषों की स्मृतियाँ मानस पटल पर तैर जाती हैं तो वीर अब्दुल हमीद , स्वतंत्रता संग्राम के शहीद शिवपूजन राय, स्वामी सहजानन्द सरस्वती, सरजू पाण्डेय , गोपाल राम गहमरी, कुबेरनाथ राय और….और…इस अंचल की.ऐसी ही दर्जनों महाविभूतियाँ हमें अपने भीतर झाँकने को प्रेरित करती हैं। तब, निश्चित तौर पर वर्तमान राजनीति की शुचिता भी कटघरे में खड़ी होती है…./और अपने ही द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि यों का बौनापन ,बचकानापन हमें भीतर तक झकझोर देता है…।
मगर,भाई! जब हमारे एहसास मर जाते हैं तो हमारा चिंतन भी भोथरा हो जाता है और हम कोल्हू के बैल की पट्टियो को अपनी नियति मानकर /अनाचार- अनीति के राजनीतिक गणेश की परिक्रमा प्रारंभ कर, एक अनिश्चित भविष्य -निर्माण में संलग्न हो जाते हैं और एक अपरिचित भारत माता की जय बोलकर आत्मप्रवंचना के शिकार होते रहते हैं/ अगले दिन चाह लिए चाय वाले को लक्षित कर खरामा- खरामा फिर हमारे कदम बढ़ जाते हैं उसी बंगाली मोशाय की चाय की दुकान तक।
जमाने से पुराने जमानिया में गुजराती चाय का जायका लेने… जहाँ नीबू की चाय में नमक की फरमाईश करते हुए विराट कोहली के जीत के जश्न की चर्चा में, मोदी की लोकतांत्रिक हार की प्रस्तावना से नई बहस का आगाज करते है।
दर्शक दीर्घा बहस के अन्दाज से मुदित होता रहता है /यहाँ का यही अंदाजे रोजनामचा है /क्योंकि. ../ज्यों कदलिन के पात पे , पात पात पे पात /त्यों सुधिजन की बात पे , बात बात पे बात ।।। जी हाँ , ऐसा ही है अपना गौरवशाली जमानियाँ … आपको पता है /जरूरत है तो बस जमाने की जायज नजरिए की /साभार,सादर
(बस यूँ ही )ज़मानियाँ_ज़माने_की_नज़रों_में तो , रहेगा इंतज़ार … हाँ वहीं.. बंगाली मोशाय तक।
लेखक– कुमार शैलेन्द्र

