Tuesday, July 14, 2026
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उत्तर प्रदेश में सपा का जलवा, भाजपा को पूर्ण बहुमत  लाने की कोशिशों को किया नाकाम।

उत्तर प्रदेश में सपा का जलवा, भाजपा को पूर्ण बहुमत  लाने की कोशिशों को किया नाकाम।

लखनऊ – वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का राहुल और अखिलेश की जोड़ी कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर सकी लेकिन वर्ष 2024 के चुनाव में कमाल कर गया। वहीं इस लोकसभा चुनाव में इस जोड़ी ने उस जोड़ी की सीटें करीब आधी कर दी। ऐसी उम्मीद शायद खुद इस गठजोड़ को नहीं रही होगी।2014 में लोकसभा चुनाव में भी ऐसा अनुमान गलत साबित हुआ था जब भाजपा को उम्मीद से कहीं ज्यादा अप्रत्याशित रूप से 71 सीटें मिल गई थीं। वहीं बड़े चेहरे की चकाचौंध पर इतराती भाजपा ने जहां इस अति आत्मविश्वास से टिकट वितरण किए कि वो जिसे चाहेंगे जिता लेंगे, वहीं अखिलेश ने इसमें सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ध्यान रखा।

जहाँ मुस्लिमों और यादवों को बिना सोचे-समझे और अनुपात से ज्यादा टिकट देने की गलती इस बार नहीं दोहराई। साथ ही इससे बचे टिकट पिछड़ों व दलितों को देकर उन्हें अपनी तरफ कर लिया। इस इंजीनियरिंग का ऐसा जोर चला कि बड़े- मंत्री तक धराशाई हो गए और मार्जिन की लड़ाई लड़ रहे नरेंद्र मोदी की जीत पर भी यह असर डाल गया।

इस चुनाव की एक गौरतलब बात यह रही कि पूरा जोर लगाने के बावजूद धार्मिक ध्रुवीकरण न किया जा सका, अलबत्ता मुस्लिम वोट जरूर और मजबूती से सपा का बेस वोट बैंक बना रहा। इस चुनाव में जाति तुरुप का पत्ता रही। अखिलेश ने इसे समझदारी से चला। भाजपा समर्थक मानी जानी वाली पिछड़ी व दलित जातियों को आगे बढ़कर टिकट दिए।

जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सामान्य सीटों तक पर दलित प्रत्याशी उतार दिया। बेस वोट बैंक से प्रत्याशी की जाति का वोट जुड़ा तो नतीजा सामने है। इंडिया गठबंधन भीषण गर्मी के बीच आमजन को महंगाई, बेरोजगारी मुद्दों की तपिश महसूस कराने में कामयाब रहा।

साथ ही पवित्र पुस्तक संविधान से छेड़छाड़ के मुद्दे को इतना जज्बाती बना दिया कि अमूमन पिछड़ों के साथ आने से परहेज करने वाले दलित तबके ने इस बार राह बदल ली। आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने के बाद अपने कोटे को लेकर आशंकित समुदाय ने भी अपना मन बदला और कहीं-कहीं भाजपा का साथ छोड़ गया। इस चुनाव की एक बेढब बात यह रही कि ज्यादातर मामलों को मुद्दा बनाकर जनता के बीच छोड़ा जा रहा था और वास्तविक मुद्दे दरकिनार करने की कोशिश की गई। यह तरीका भी वोटर को अखरा।

बेरोजगारी के मारे पूर्वांचल के युवा अग्निवीर भर्ती पर सबसे ज्यादा मुखर दिखे और इस हिस्से में सत्तारूढ दल को सबसे जोर का झटका लगा। राम मंदिर का मुद्दा कितना चला, इस सवाल का जवाब यह है कि भाजपा अयोध्या मंडल की सभी सीटें हार गई। अयोध्या की ही जीती सीट गवां दी। चुनाव तीन महीने पहले होते तो शायद राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की लहर वोटों में बदलती। अधिक सीटें जीतने पर यूपी से योगी को हटाया जा सकता है, इस नैरेटिव ने भी असर डाला।

इंडिया गठबंधन अपनी कुछ खूबियों से कामयाब हुआ तो भाजपा को कुछ गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ा। राज्य की राय किनारे कर खराब छवि वाले कई सांसदों का टिकट काटने से परहेज किया गया। कई सीटों पर सांसद विरोधी लहर को नजरअंदाज किया गया।

इससे संगठन के मनोबल पर असर पड़ा। बीच चुनाव संघ के सहारे को खारिज करने का राष्ट्रीय अध्यक्ष का बयान स्वयंसेवकों को नागवार गुजरा और वे चुनाव में जुटे तो लेकिन मन से नहीं। संगठन को भी गुमान रहा कि सरकार तो अपनी ही बन रही, लिहाजा कार्यकर्ता पहले की तरह उत्साहित नहीं दिखे और घर से निकल कर वोटर को घर से न निकाल सके।

राममंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा , हिन्दूराष्ट्र और भारत विकास की धारा भी नही बचा सकी भारतीय जनता पार्टी की शाख।

भारतीय जनता पार्टी ने अयोध्या राममंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और निर्माण को जिस तरह से जनता के बीच उठाया, उसका फायदा उसे नहीं मिला। राममंदिर के इर्द-गिर्द की लोकसभा सीटें भी भाजपा हार गई। अयोध्या मंडल में उसका रिपोर्ट कार्ड जीरो रहा। इतना ही नहीं वर्ष 2019 के चुनाव में भाजपा ने मध्य यूपी की 24 में से 22 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार उसे इस क्षेत्र में 12 सीटों का नुकसान हुआ। वहीं, कांग्रेस को 3 और सपा को 10 सीटों का फायदा हुआ।अयोध्या मंडल की फैजाबाद सीट भी भाजपा नहीं बचा सकी। सपा ने अयोध्या में दलित प्रत्याशी व पूर्व मंत्री अवधेश प्रसाद को उतारा, जिन्होंने भाजपा के लल्लू सिंह को 50 हजार से ज्यादा मतों से पराजित किया। इस मंडल की सबसे चर्चित सीट अमेठी में भाजपा प्रत्याशी व कद्दावर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी कांग्रेस के केएल शर्मा के सामने टिक नहीं सकीं। बाराबंकी में कांग्रेस के तनुज पुनिया ने दो लाख से ज्यादा मतों से भाजपा प्रत्याशी राजरानी रावत को हराकर साबित कर दिया कि मंदिर से उपजी किसी तरह की लहर यहां तक नहीं पहुंच सकी।

अयोध्या मंडल के अम्बेडकरनगर क्षेत्र में पिछली बार | बसपा के टिकट पर सांसद चुने गए रितेश पांडे पर भाजपा ने इस बार दांव लगाया था। उसका यह दांव भी फ्लॉप साबित हुआ। सपा के लालजी वर्मा ने उन पर बढ़त ली। अयोध्या मंडल की ही सुल्तानपुर सीट आठ बार की सांसद मेनका गांधी नहीं जीत सकीं। रायबरेली में राहुल गांधी की प्रचंड जीत ने दिखा

अयोध्या मंडल में भाजपा का रिपोर्ट कार्ड रहा जीरो, धार्मिक की जगह जातीय ध्रुवीकरण प्रभावी

कन्नौज में अखिलेश यादव की धार्मिक ध्रुवीकरण के बजाय जातीय जबरदस्त जीत ने दिखा दिया कि ध्रुवीकरण क्षेत्र में ज्यादा प्रभावी रहा। अखिलेश के वहां कराए पुराने कामों ने भी उनकी काफी मदद की। इटावा सुरक्षित सीट भी इस बार सपा ने भाजपा से छीन ली।

दिया कि सभी वर्गों का उन्हें भरपूर समर्थन मिला। खीरी में केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के खिलाफ थार कांड के बाद उपजे गुस्से का भाजपा ठीक से आकलन नहीं कर पाई। नतीजतन, सपा के उत्कर्ष वर्मा ने उनसे यह सीट छीन ली। धौरहरा में भाजपा की रेखा वर्मा भी थोड़े मार्जिन से सपा के आनंद भदौरिया से हार गईं। सीतापुर में तो शुरुआत में खुद कांग्रेस को भी उम्मीद न थी कि उसका प्रत्याशी फाइट में आ जाएगा। राजेश वर्मा के पांच साल जनता से दूर रहने का खामियाजा भाजपा ने यह सीट गंवाकर उठाया।

पर पिछले चुनाव के मुकाबले यह अंतर उल्लेखनीय रूप से कम है। तब उनकी जीत का अंतर 3.47 लाख था। वहीं, मोहनलालगंज में भाजपा सांसद कौशल किशोर के खिलाफ गुस्से को भी पार्टी नहीं पकड़ पाई और सपा के आरके चौधरी ने उन्हें करीब 80 हजार मतों से पटखनी दी। अलबत्ता, कैसरगंज में पहलवान से संबंधित आरोपों की गूंज असर करती हुई नहीं दिखी। यहां भाजपा के करण भूषण सिंह प्रतिद्वंद्वी सपा प्रत्याशी पर काफी भारी पड़े। अलबत्ता, हरदोई, मिश्रिख, उन्नाव, गोंडा, कानपुर, अकबरपुर और बहराइच भाजपा बचाने में सफल रही। फर्रूखाबाद सीट भाजपा ने मामूली अंतर से जीती।

लखनऊ में भाजपा के राजनाथ सिंह 1 लाख 35 हजार मतों से जीते, फतेहपुर में केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति को पछाड़कर सपा प्रत्याशी नरेश उत्तम पटेल ने सबको चौंका दिया, क्योंकि सपा ने उन्हें नामांकन के आखिरी दो दिनों में अपना प्रत्याशी बनाने का फैसला किया था। कौशांबी में राजनीतिक अनुभव से विहीन सपा के पुष्पेंद्र सरोज ने भाजपा के दो बार के सांसद विनोद सोनकर को हराकर बता दिया कि आम मतदाताओं में इंडिया गठबंधन के मुद्दे किस सीमा तक प्रभावी रहे।

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